कलेक्टरी की परीक्षा में भारतीय भाषाएँ सौतेली?

  • 13 मार्च 2013
Image caption सिविल सेवाओं में अब अंग्रेज़ी अनिवार्य ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ी में बड़ा स्कोर फायदे का सौदा होगा.

कलेक्टर बनने के लिए भारत की भाषाएँ जानना अब ज़रूरी नहीं हैं, पर अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आप सिविल सेवा परीक्षा में नहीं बैठ सकते.

संघ लोकसेवा आयोग के इन नए नियमों के लागू होने के बाद ये मामला उबाल पर है.

बुधवार को कई सांसद सरकार के कार्मिक मंत्री से मिलकर इस मुद्दे को उठाने वाले हैं. राज्यसभा में तेलुगु देसम पार्टी के नेता पीसी रमेश ने इस सिलसिले में केंद्रीय मंत्री नारायणस्वामी को चिट्ठी लिखी है.

प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लेने वाले छात्र अलग उत्तेजित हैं.

भारतीय भाषाओं को किनारे कर अंग्रेजी को प्राथमिकता देना हजारों सपनों के साथ खिलवाड़ की तरह देखा जा रहा है.

अशोक वाजपेयी हिंदी के कवि हैं और सेवानिवृत्त आईएएस भी. नाराज़ वे भी हैं, ‘‘मेरे वक्त अंग्रेजी ही (लोकसेवा प्रतियोगिता की भाषा) थी. भारतीय भाषाएं बाद में जुड़ीं. अब उन्हें परीक्षा से हटाने का कदम बाधा पैदा करता है. आईएएस या आईपीएस अफ़सर काम तो राज्य में ही करेगा. उसके लिए क्षेत्रीय भाषा जानना ज़रुरी है.’’

संघ लोकसेवा आयोग में परीक्षाओं के नए नियम निगवेकर कमिटी ने बनाए थे जिसे अब कैबिनेट मंजूरी के बाद लागू किया जा रहा है. नए नियमों के तहत कोई भी परीक्षार्थी तब तक किसी क्षेत्रीय भाषा में परीक्षा नहीं दे सकता जब तक और 25 परीक्षार्थी इस भाषा में परीक्षा न दे रहे हों.

इसके अलावा अंग्रेजी़ भाषा के नंबर भी स्कोर में जोड़े जाने का प्रावधान भी कई लोगों को नागवार गुज़रा है. पुराने नियमों के तहत अंग्रेजी भाषा के अलावा परीक्षार्थी आठवीं अनुसूची की किसी भी भाषा में एक पेपर लिख सकते थे जिसमें सिर्फ पास करना अनिवार्य था.

अब अन्य भाषाओं को हटा दिया गया है और सिर्फ अंग्रेज़ी रखी गई और इसमें ज्यादा नंबर लाने से परीक्षार्थी को लाभ दिया गया है.

सिविल सेवा की तैयार कर रहे एक छात्र चंदन शर्मा कहते हैं कि इससे हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के छात्रों को बहुत नुकसान होगा.

वो कहते हैं, ‘‘अब लिखित परीक्षा में दो महीने से कम है. ऐसे में पढ़ने की सामग्री कहां से मिलेगी. अंग्रेज़ी में तो पहले पास मार्क ही ज़रुरी था. हम जैसे लोग जो हिंदी पट्टी के गांवों से हैं उनके लिए कठिन होगा परीक्षा पास करना.’’

क्षेत्रीय भाषाओं का नुकसान

इस मुद्दे को तेलुगु देसम पार्टी के सांसद पीसी रमेश ने सदन में भी उठाया था.

मंगलवार को बीबीसी से बात करते हुए रमेश ने कहा, ‘‘मैंने तेलुगु भाषा को हटाने का मुद्दा उठाया लेकिन मैंने पाया कि कई और क्षेत्रीय सांसद इस मुद्दे पर मेरे साथ थे. सबने मेरा समर्थन किया. क्षेत्रीय भाषाओं के बच्चों को बहुत नुकसान होगा. मैंने मंत्री नारायणस्वामी को चिट्ठी लिखी है और हम बुधवार को कुछ सासंदों को लेकर उनसे मुलाक़ात भी करने की कोशिश करेंगे.’’

इस मुद्दे पर जब बीबीसी ने संघ लोक सेवा आयोग में बात करने की कोशिश की तो किसी ने बात नहीं की.

एक अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर इतना ही कहा कि ये अधिसूचना सरकार से आई है और आयोग का काम सिर्फ और सिर्फ अधिसूचना का पालन करना है.

संघ लोकसेवा आयोग की तरफ से इंटरव्यू ले चुके अशोक वाजपेयी इस सरकारी रवैये की कड़ी आलोचना करते हैं, ‘‘कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में था तो एक दलित लड़की ने तेलुगु में इंटरव्यू दिया था. उसकी प्रतिभा का जवाब नहीं था किसी के पास लेकिन वो अंग्रेज़ी नहीं जानती थी. अब वैसे लोगों का क्या होगा. ये एक किस्म की नए तरह की औपनिवेशिकता है जो समझती है कि अंग्रेज़ी ही भवसागर पार करा सकती है.’’

निगवेकर कमिटी की सिफारिशें सरकार ने लागू तो कर दी हैं लेकिन बडे़ पैमाने पर सरकार के इस फैसले का विरोध हो रहा है.

निजी क्षेत्र की नौकरियों में पहले से ही अंग्रेज़ी का महत्व बढ़ा है लेकिन लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं के मेधावी छात्र बेहतर करते रहे हैं. हालांकि अब नई व्यवस्था में ये कहना मुश्किल होगा कि ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले बच्चे कितना बेहतर कर सकेंगे.

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