एसिड अटैक :सर्जरी के बाद भी नहीं बदलेगी ज़िंदगी

  • 8 मार्च 2013

दिल्ली की रहने वाली अनु से ये मेरी पहली मुलाकात थी. वो एक तंग सी गली में किराए के छोटे से मकान में रह रही थी जहाँ रोशनी भी कंजूसी से अंदर आती है.

मेरे साथी देबाशीष ने मुझसे कहा कि वीडियो शूट के लिए रोशनी कम पड़ रही है. हम इसी उधेड़ बुन में उलझे हुए थे लेकिन अपने कमरे में बैठी अनु को रोशनी होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

तेजा़ब हमले के बाद इच्छामृत्यु माँगी थी: सोनाली

उसकी आँखों की रोशनी नौ साल पहले जा चुकी है. आपसी रंजिश में उनकी एक साथी और उसके भाई ने उनके चेहरे पर साल 2004 में तेज़ाब डाल दिया था. आँखों का तो नामो निशान ही नहीं बचा. सर्जरी के बाद चेहरा थोड़ा बहुत ठीक हुआ है. लेकिन ज़िंदगी तब से थम गई है.

कभी अनु खूबसूरत थीं. वो बचपन से भले ही अनाथ थी पर आत्मनिर्भर थी. लेकिन तेज़ाब फेंके जाने के हादसे ने उसकी ज़िंदगी बदल दी. आज वो खुद को महज़ ज़िंदा लाश बताती हैं.

एसिड अटैक: जिस्म नहीं ज़हन भी छलनी होता है

आपबीती बताते-बताते उसके आँसू थमते नहीं थमते. बहते आँसुओं के बीच उसने अपनी बात मुझे बताई, “मैं बचपन में अनाथ हो गई थी. पढ़ाई छोड़ फैक्ट्री में कुछ दिन काम किया. मुझे डांस का बहुत शौक था. किसी ने कहा होटल में डांसर बन जाओ. मेरा काम सबको पसंद आया. देखते ही देखते मेरी दुनिया बदलने लगी. मुश्किल हालातों के बीच मैने अपनी मंज़िल ढूँढ ली थी. लोग मेरी खूबसूरती और डांस की तारीफ करते थे अच्छा लगता था. लेकिन मेरी एक साथी मुझसे जलने लगी. 19 दिसंबर 2004 की सर्द रात थी. मैं ऑटो में बैठने के लिए बाहर निकली तो मेरी साथी और उसके भाई ने मुझ पर तेज़ाब फेंक दिया. तेज़ाब से कपड़े भी जल गए. एक व्यक्ति ने मेरे उघड़े तन को अपनी कमीज़ से ढका.”

(ये रिपोर्ट अब आज शाम बीबीसी के टीवी कार्यक्रम ग्लोबल इंडिया में भी देख सकते हैं)

चंद तस्वीरों में सिमटी ज़िंदगी

तब से अनु को अपनी ज़िंदगी बोझ लगने लगी है और वो खुद को एक ज़िंदा लाश बताती है. न कमाई का कोई ज़रिया रहा, न जीने की कोई वजह.

आँखों की रोशनी वापस आने या सर्जरी के लिए लाखों रुपयों की ज़रूरत है. सरकार से अनु को कोई उम्मीद नहीं, हाँ समाज से ज़रूर आस है कि कोई उसकी ज़िंदगी में चंद लाख की सौगात लेकर आएगा.

दिल्ली में पानी की तरह बिकता है तेज़ाब

साथी के नाम पर अनु के साथ दिनभर उनका प्यारा कुत्ता फ्रूटी रहता है. मुस्कुराहट कभी कभी ही उनके होठों को छूती है- जब वो फ्रूटी के साथ होती है या फिर जब उनके हाथ में पुरानी फोटो एलबम होती है.

पुरानी यादों के रूप में अनु के पास ये तस्वीरें ही बची हैं. शायद इसलिए अपनी एलबम को वो किसी और के हाथों में सुरक्षित नहीं मानती. हर आने वाले को वो बड़े चाव से एलबम देखने के लिए देती है लेकिन हर पाँच मिनट में पूछती रहती हैं- एलबम में सब तस्वीरें वापस रख दीं आपने ?

धर्म की शरण में

अनु के मामले में दोषियों को सज़ा तो हुई थी पर जल्द ही वे ज़मानत पर छूट गए. अनु के मन में आज भी कई सवाल है. अनु का कहना है, मैं सरकार से पूछना चाहती हूँ कि किसी की ज़िंदगी हमेशा का लिए बर्बाद करने की सज़ा केवल पाँच साल कहाँ का न्याय है?

मैं अपने जैसी कई लड़कियों से मिली हूँ. उनके इलाज, दवाई और पुनर्वास की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

अपने दर्द से ऊपर उठ कर अनु ज़िंदगी में संभलने की कोशिश तो कर रही है पर निराशा उसे बार-बार घेर लेती है. इस घर का किराया नहीं दे पा रही, इसलिए मकान खाली कर दिया है.

हर ओर से नाउम्मीद अनु ने अब धर्म और आध्यात्म में शरण ली है. वो अब ईसा मसीह को मानती हैं. लेकिन वो ये भी जानती है कि पहले वाली खूबसूरत और यौवन से भरभूर लड़की कभी वापस नहीं आएगी. लेकिन अनु को उस हालत में पहुँचाने वाले आज़ादी से घूम रहे हैं और ज़िंदगी जी रहे हैं.

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